शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

तंत्र के गण-अधिकार को बनाया हथियार, चमत्कार

एक अधिकार जो बन गया हथियार। सूचना का अधिकार। भ्रष्टाचार की जड़ खोदने का हथियार। हक की जंग में फैसलाकुन हथियार। हम सब के बीच से आगे निकलकर कुछ लोगों ने इस हथियार को अपनाया है। सैकड़ों-हजारों वंचितों को उनका हक दिलाया है। कुछ ऐसे मुद्दों-मसलों को परवान चढ़ाया है, जो नजीर बन गए हैं या बनने जा रहे हैं। व्यवस्था में उलट-फेर का सबब बन रहे हैं। सूचना के अधिकार की जंग के तीन सिपहसालार किस संजीदगी से गणतंत्र की बुनियाद मजबूत करने में जुटे हैं, जानिए-

खत्म करना है भ्रष्टाचार

जजों की संपत्तिकी घोषणा जब-जब जिक्र में आएगी, सुभाष चंद्र अग्रवाल खुद-ब-खुद उभर जाएंगे। क्योंकि इस जिदेजहद की शुरूआत सुभाष चंद्र अग्रवाल ने ही की थी, जो भारत के प्रधान न्यायाधीश के पद तक जा पहुंची है। सुभाष चंद्र अग्रवाल दिल्ली में चांदनी चौक दरीबा कलां के रहने वाले हैं। लक्ष्य तय कर रखा है-'खत्म करना है भ्रष्टाचार।' कोशिश जारी है, कामयाबियों के साथ। हालांकि वह अपनी कोशिशों को महज शुरुआत मानते हैं। कहते हैं-'लोगों को उत्पीड़न के खिलाफ बोलना जरूर चाहिए। तरीका खुद चुना जा सकता है।' बकौल सुभाष, बचपन में वह दब्बू थे। चुपचाप अन्याय सह-देख लेते। लेकिन एक वाकए ने पूरी तासीर ही बदल दी। तब सुभाष दिल्ली कालेज आफ इंजीनियरिंग के छात्र थे। कालेज से घर वापसी के दौरान माल रोड पर डीटीसी बस में बैठे और कंडक्टर से टिकट मांगा। टिकट बीस पैसे का था। कंडक्टर ने पांच पैसे लिए मगर टिकट नहीं दिया। यानी सरकार को चूना लगा और पैसा गया कंडक्टर की जेब में। सुभाष ने विरोध किया, तो डपट मिली-'दिल्ली में नए हो क्या।' वह चुपचाप बस से उतर गए। घर लौटकर एक अखबार में संपादक के नाम पत्र लिखा, अगले दिन छप भी गया। उस एक पत्र से दिल्ली परिवहन में मानो भूचाल आ गया। उसी दिन अधिकारी कंडक्टर को लेकर कालेज पहुंचे। कंडक्टर ने सुभाष से माफी मांगी। सुभाष को छपे शब्दों की ताकत का अहसास हुआ। उसी दिन से उन्होंने जनहित के विषयों पर अखबारों को पत्र लिखना शुरू किया। 31 जनवरी, 2006 तक वे 3699 पत्र लिख चुके थे। इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक में आया। 12 अक्टूबर, 2005 को जब आरटीआई एक्ट [सूचना का अधिकार] अस्तित्व में आया तो उसे हक दिलाने और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का हथियार बना लिया। अग्रवाल अभी तक करीब पांच सौ आरटीआई लगा चुके हैं जिसमें से सवा सौ के करीब की सुनवाई केंद्रीय सूचना आयोग में हो चुकी है और सौ से अधिक मामलों में फैसला भी पक्ष में आया है। इस अधिकार के तहत चुनाव बैंकिंग, परिवहन, संचार व्यवस्था में सुधार की उनकी मुहिम चालू है।

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नहीं होंगे रिटायर कभी

कमोडोर लोकेश बत्रा। 36 वर्ष तक नौसेना में रहकर देश सेवा की। कहने को तो वर्ष 2003 से सेवानिवृत हैं, लेकिन सही मायनों में नहीं। वह गणतंत्र की सेवा किए जा रहे हैं, जिस तरह एक सच्चे गण को करना चाहिए। ज्यादातर लोग छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर तंत्र को कोसते रहते हैं। लेकिन लोकेश बत्रा ने कोसने के बजाए कुछ करने का बीड़ा उठाया। उनके प्रयास का ही नतीजा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में सूचना के अधिकार [आरटीआई] की अपील की सुनवाई के लिए देश के सभी जिलों को वीडियो कांफ्रेंसिंग व्यवस्था से जोड़ा गया। नोएडा प्राधिकरण में आरटीआई के लिए सभी सूचनाओं को आनलाइन कर दिया गया है। नोएडा के सेक्टर-25 स्थित जलवायु विहार में वह बस गए हैं। 63 वर्ष की आयु में भी वह जवानों पर भारी पड़ते हैं। उन्होंने सूचना का अधिकार एक्ट के हिंदी संस्करण में 34 त्रुटियों को ठीक कराया। पासपोर्ट कार्यालय में सेक्शन 4 को मानने से मना कर दिया था। बाद में उन्होंने आरटीआई के माध्यम से उसे देश के सभी पासपोर्ट कार्यालय में लागू कराया। बत्रा कहते हैं कि आरटीआई को उन्होंने लोकतंत्र की व्यवस्था सुधारने का हथियार बनाया। वह बताते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय में आरटीआई के लिए दो अलग-अलग स्थानों पर जाना पड़ता था। एक जगह फाइल देखी जा सकती थी और दूसरी जगह पैसे जमा किए जा सकते थे। प्रधानमंत्री के साउथ ब्लाक स्थित कार्यालय में न तो गाड़ी पार्किग और न ही टायलेट की व्यवस्था थी। इसकी शिकायत भी आरटीआई के माध्यम से उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में की। बाद में जन सूचना अधिकारी को साउथ ब्लाक से हटाकर रेल भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। बत्रा कहते हैं-आरटीआई का प्रयोग करते रहना चाहिए, जब तक आप व्यवस्था को ठीक नहीं करा देते।

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नेत्रहीन मसीहा

ईश्वर ने सतपाल सिंह बैरसियां की आंखों में नूर नहीं बख्शी है। लेकिन वह दूसरों की जिंदगी को रोशन करते हैं। जरिया है सूचना का अधिकार। सतपाल सिंह बैरसियां पंजाब में नवां शहर के रहने वाले हैं। हुआ यह कि गांव में कुछ गरीब लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला। सतपाल सिंह के मन में एक कसक उठी। उन्हें रेडियो सुनने का बेहद शौक है। रेडियो पर राइट-टू-इनफारमेशन कानून के बारे में सुनकर एक संकल्प लिया। बस यहीं से शुरू हुआ गरीबों को न्याय और इंसाफ दिलाने का सफर। पिछले तीन वर्ष से सतपाल सिंह तकरीबन प्रत्येक सरकारी विभाग से जानकारी आरटीआई के जरिए लेकर लोगों को न्याय दिलाने के सफर को आगे बढ़ा रहे है। सतपाल सिंह को पता चला कि जिला खुराक विभाग ने गांव के बीपीएल श्रेणी के पांच लोगों के नाम नीले कार्ड की सूची से काट दिए है। उन्होंने सूचना अधिकार एक्ट का इस्तेमाल कर इंसाफ दिलाया। इसी तरह सतपाल सिंह ने शिक्षा विभाग, पंचायत विभाग, बिजली विभाग से लेकर जिला कल्याण विभाग तक से सूचना अधिकार एक्ट के जरिए लोगों को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

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