शनिवार, 23 जनवरी 2010

पैसा और रसूख हो तो पढ़ाई का धंधा सबसे चोखा

नई दिल्ली [राजकेश्वर सिंह]। पढ़ाई का धंधा सबसे आसान है। सरकार की मुहर भी लग ही जाती है। इसलिए तकनीकी से लेकर चिकित्सा तक और वाणिज्य से कला तक हर क्षेत्र में ऐसे शिक्षा संस्थान उग आए, जिनमें बहुत कुछ संदेहास्पद है मगर इन्हें नियम कानूनों के पेंच के सहारे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग [यूजीसी], चिकित्सा परिषद [मेडिकल काउंसिल] और तकनीकी शिक्षा परिषद [एआईसीटीई] की मंजूरी मिल जाती है। ताजा सूरते हाल यह है कि कुल 480 विश्वविद्यालयों में से 148 और कुल 22 हजार कालेजों में से सिर्फ 3942 ही सरकार के अधिकृत प्रमाणन संस्था राष्ट्रीय मूल्याकंन एवं प्रत्यायन बोर्ड [एनएएसी] से मान्यता प्राप्त हैं।

उच्च शिक्षा का पूरा ढांचा किल्लत का बाजार है इसलिए इन निजी व्यापारियों की हर तरफ पौ बारह है। उच्च शिक्षा में बुनियादी ढांचे की कमी है। मोटेतौर पर लगभग तीन सौ और विश्वविद्यालयों और दो हजार से अधिक कालेजों की जरूरत है। उनमें भी 18 से 24 साल के बच्चों की संख्या के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में 63, बिहार में 32, पश्चिम बंगाल में 30, महाराष्ट्र में 20 और राजस्थान में 13 और विश्वविद्यालयों की दरकार है। सरकार इसे पूरा करने की स्थिति में नहीं है। नतीजा यह है कि निजी क्षेत्र फल-फूल रहा है।

जरा गौर करिए। किसी को इंजीनियरिंग कालेज या फिर अपने कालेज को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाना है तो सीधे केंद्र सरकार को आवेदन करना होता है। उसके बाद उस आवेदन पर अगली कार्रवाई का जिम्मा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद [एआईसीटीई] और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग [यूजीसी] पर है। दोनों मामले में तरीका एक ही है। विशेषज्ञ समितियां ही उन कालेजों का भौतिक सत्यापन करती हैं। विशेषज्ञ समितियां की सिफारिशों पर ही सरकार भी अपनी मुहर लगा देती है और फिर कालेज या डीम्ड यूनिवर्सिटी चल पड़ती है। भले ही उसके बाद वे जरूरी मापदंडों को पूरा करते हों या नहीं।

सूत्र बताते हैं होना तो बहुत कुछ चाहिए, लेकिन वह सब होता कहां है। मसलन् किसी संस्थान के पास कुल जमीन कितनी है। खुद की है या फिर लीज पर है। पढ़ाने के लिए कमरे कितने हैं। छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग हास्टल हैं या नहीं। लैब कैसा है? सभी शिक्षक उच्च शिक्षा के नियत वेतनमान के दायरे में हैं। संस्थान का नियमित निदेशक या प्रिसिंपल है या नहीं।

सभी फैकल्टी का भविष्य निधि [पीएफ] कटता है या नहीं। शिक्षक व छात्र अनुपात मानक के लिहाज से है या नहीं। उसके पाठ्यक्रम राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं या नहीं। संस्थान राष्ट्रीय मूल्याकंन एवं प्रत्यायन बोर्ड से प्रमाणित है या नहीं? इसके अलावा फीस वसूली और दाखिले की प्रक्रिया जैसे मामले भी महत्वपूर्ण हैं।

इसी तरह निजी क्षेत्र में मेडिकल कालेज खोलने के भी नियम-कायदे हैं। सरकार और मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया के बीच वहां भी आवेदनों पर विशेषज्ञ समिति की मौका-मुआयना रिपोर्ट ही मायने रखती है। सूत्रों के मुताबिक मापदंड तो और भी हैं, लेकिन सबके लिए अलग से कानून नहीं है। अलबत्ता नियम-कायदे हैं, लेकिन उसमें ही बीच का रास्ता निकल आता है।

शिक्षा की ऊंची और निजी 'दुकानों' का खेल कैसा है? 126 डीम्ड विश्वविद्यालयों की समीक्षा में 44 के मापदंडों पर खरे न उतरने से सच्चाई सामने आ चुकी है। इधर घोटालों से बदनाम हुई एआईसीटीई ने कागजी खेल बंद करके सब कुछ आनलाइन कर दिया।

शिक्षा में भ्रष्टाचार की भरमार

नई दिल्ली [नीलू रंजन]। उदार बाजार में शिक्षा का कारोबार भ्रष्टाचार का नया गढ़ है। पिछले छह महीने में ही सीबीआई शिक्षा में फैले भ्रष्टाचार से संबंधित लगभग तीन दर्जन मामले दर्ज कर चुकी है। जिनमें दो दर्जन से अधिक मामले अकेले अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद [एआईसीटीई] के अधिकारियों के खिलाफ हैं। सीबीआई एआईसीटीई के सदस्य सचिव के नारायण राव को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर चुकी है। इसी तरह राष्ट्रीय अध्यापक परिषद और वास्तुकला परिषद के अधिकारियों के खिलाफ भी सीबीआई ने नया केस दर्ज किया है।

सीबीआई द्वारा दर्ज मामलों के अनुसार भ्रष्टाचार के पैमाने पर सबसे ऊपर देश की तकनीकी शिक्षा को नियंत्रित करने वाली अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद [एआईसीटीई] है। जहां एआईसीटीई के तत्कालीन सदस्य सचिव के नारायण राव आंध्रप्रदेश के एक निजी इंजीनियरिंग कालेज को मान्यता देने के एवज में पांच लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार हो चुके हैं। वहीं सीबीआई ने एआईसीटीई के अध्यक्ष आारए यादव समेत अन्य अधिकारियों के खिलाफ फरीदाबाद के एक शिक्षण संस्थान की सीटें बढ़ाने के लिए रिश्वत मांगने का मामला दर्ज किया है।

पहली बार एआईसीटीई के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज किए गए। जब सीबीआई ने जांच शुरू की तो वहां फैले भ्रष्टाचार को देखकर उसके होश उड़ गए। हालत ये है कि सीबीआई छह महीने के भीतर ही एआईसीटीई के अधिकारियों के खिलाफ 25 से अधिक एफआईआर दर्ज कर चुकी है और अभी भी यह सिलसिला नहीं रुका है।

बात सिर्फ एआईसीटीई की नहीं है। देश भर के शिक्षक प्रशिक्षण कालेजों को मान्यता देने वाली राष्ट्रीय अध्यापक प्रशिक्षण परिषद [एनसीटीई] में भी भ्रष्टाचार के मामले खुलकर आ रहे हैं। सीबीआई ने एनसीटीई के अधिकारियों के खिलाफ पिछले दिनों एक साथ सात एफआईआर दर्ज की हैं।

इन अधिकारियों पर भी एआईसीटीई की तरह ही रिश्वत लेकर अध्यापक प्रशिक्षण कालेजों को मान्यता देने का आरोप है। वहीं एनसीटीई के अध्यक्ष प्रो एमए सिद्दीकी के खिलाफ खुद मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव एके सिंह ऐसे ही आरोपों की जांच कर रहे हैं। सिद्दीकी के खिलाफ कांग्रेस के एक सांसद ने कालेजों को मान्यता देने में गड़बड़ी करने का आरोप लगाया था।

इसके अलावा वास्तुकला की शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी के लिए बनाई गई वास्तुकला परिषद के अध्यक्ष समेत तमाम अधिकारी सीबीआई के निशाने पर हैं। सीबीआई ने उनके खिलाफ प्रारंभिक जांच का केस दर्ज किया है। गौरतलब है कि खुद मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने वास्तुकला परिषद के अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत करते हुए सीबीआई से जांच की सिफारिश की थी। इसी तरह यूजीसी में कुछ मामलों की जांच केंद्रीय सतर्कता आयोग कर रहा है। जागरण डाटकाम

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