शनिवार, 14 अप्रैल 2012

            उम्मीद तो है 
इस  नई सुबह की आहट से,
क्या  रात  का जादू टूटेगा,
 क्या वक्त निंगू हो जाएगा,
 होंटो से  तरन्नुम  फूटेगा,
 उम्मीद तो है,उम्मीद तो है,

ये बात सयाने कहते है,
हर खव्वाब की मंजिल होती  है,
 नारगिस भी इक दिन हंसती  है,
 हर आंसू  बनता  मोती है,
 एक गीत जर्मी से उठता है,
 आवाज  फलक तक जाती है,
 जब मह -मह मेह बरसता है,
हर शाख हरी हो जाती है,
मोसम तो आते रहते है,
क्या ऐसी रुत भी आयेगी,
जब धरती छम-छम नाचेगी,
दुख दर्द कजा ले जाएगी,
उम्मीद तो है, उम्मीद तो है,

जब प्यास बड़ी हो जाती है,
पत्थर भी पिघलने  लगते है,
जंजीर खनकने लगती है,
अरमान मचलने लगती है ,
मै अहले -खिरद से पूछ,रहा 
रूपोश हकीकत कितने दिन,
लुटते-पिटते जीते -मरते,
आवाम की हालत कितने दिन,
तुम कहते हो इतनी सारी,
उम्मीदे करना ठीक नहीं,
सच ये भी है जो मांग रहे,
वो अपना हक है भीख नहीं,
ये तुमको जेब नहीं देता,
ऐसे मै तुम खामोस रहो,
क्यों बैठे हो मेरे साथ कहों,
उम्मीद तो है,उम्मीद तो है,

शिवकुमार अर्चन 














  

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