गुरुवार, 28 जनवरी 2010

मी लार्ड के लिए क्या है कानून

नई दिल्ली [माला दीक्षित]। वी. रामास्वामी, सौमित्र सेन और पी.डी. दिनकरन के बीच क्या समानता है? आप कहेंगे कि तीनों न्यायमूर्ति हैं. मगर समानता यह नहीं है। दरअसल तीनों के मामले न्यायपालिका को लेकर संविधान की ऊहापोह की मजबूत नजीर हैं। साठ का हो चुका गणतंत्र अभी यह तय नहीं कर पाया है कि 'मी लार्ड' के लिए कौन सा कानून होगा।

जजों की नियुक्ति का प्रकरण हो या न्यायमूर्तियों की निष्ठा में खामी होने पर उपचार का, अदालत की पारदर्शिता की बहस हो या फिर न्यायिक सक्रियता की, लोकतंत्र के इस स्तंभ को लेकर संविधान में रोशनी जरा कम है।

अदालतों के अधिकारों का पेंडुलम कार्यपालिका यानी सरकार और न्यायपालिका के बीच झूलता रहा है। न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर शुरुआत में सरकार ही ताकतवर थी। लेकिन, आपातकाल के दौरान हाइ कोर्ट में जजों की तैनाती के विवादों ने सब-कुछ उलट-पलट दिया। 1977 में न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना का प्रकरण उस विवाद की इंतहा थी जब तत्कालीन सरकार ने खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए कनिष्ठ न्यायाधीश एमएच बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश बना दिया। न्यायमूर्ति खन्ना ने उसी दिन पद से इंस्तीफा दे दिया था।

इतिहास में दर्ज है कि आपातकाल में लोगों को निरुद्ध करने के सरकार के अधिकार पर फैसला करने वाली पांच जजों की पीठ में खन्ना ही सरकार के खिलाफ थे।

बाजी पलटी तो 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की शक्ति अपने हाथ में ले ली। इसके बाद अदालतों की जवाबदेही का विवाद शुरू हो गया। 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1993 के फैसले पर एक बार फिर मुहर लगा दी। नियुक्ति के लिए कोलीजियम की व्यवस्था आई और सौमित्र सेन व दिनकरन इसी व्यवस्था से नियुक्त हुए। यानी कि असमंजस कायम है। पहले अगर सरकार के अधिकार सवालों के घेरे में थे तो अब अदालतों के अपने अधिकारों पर प्रश्न चिन्ह हैं।

असमंजस की गुत्थी तब और कठोर हो जाती है जब इसमें विधायिका और कार्यपालिका की सीमाओं की बहस जुड़ जाती है। अधिकारों के बंटवारे या न्यायिक सक्रियता की बहस पिछले कुछ दशकों की सबसे हाईप्रोफाइल बहस है जिसके मूल में संविधान की अस्पष्टता ही है। कभी लोकसभा अदालतों को लक्ष्मण रेखा दिखाती है तो कभी अदालतें कहती हैं कि वह विधायिका के फैसले की संवैधानिकता और कार्यपालिका के फैसले की समीक्षा कर सकती हैं। लोकसभा अध्यक्ष व विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों के अलावा राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में अदालतों के दखल की बहसें महीनों चली हैं।

अदालतों की पारदर्शिता को लेकर भी संविधान का असमंजस कायम है। कानून से भी पहले 'राइट टू नो' का सिद्धांत देने वाली न्यायपालिका अपने घर में सूचना कानून की पैठ पर असहज है। सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ तीन फैसले आ चुके हैं। लेकिन, अभी भी उलझन है। कहते हैं कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से पर्दा हटने का डर है। बात घूम कर न्यायपालिका के लिए विधान पर आती है जो कि अभी भी अस्पष्ट है। दरअसल छह दशक बाद भी गणतंत्र अपने संविधान से लोकतंत्र के एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़े कानूनों का ब्यौरा पूछ रहा है। ध्यान रखिए कि यह हिस्सा पूरे लोकतंत्र के लिए न्याय का जिम्मेदार है।

मुख्य घटनाएं

1958 - विधि आयोग की 14वीं रिपोर्ट, जिसमें कहा गया कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की हर नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति ली जानी चाहिए। यह सलाह संविधानसभा ने नहीं मानी। आयोग की सिफारिश लागू नहीं हुई।

1973 - देश भर की बार एसोशिएशन ने बताया जजों की नियुक्ति का फार्मूला

-प्रशासनिक सुधार आयोग ने विधि आयोग की 14वीं रिपोर्ट से सहमति जताई

1977 - सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश एच.आर. खन्ना की अनदेखी कर कनिष्ठ न्यायाधीश को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। न्यायमूर्ति खन्ना ने पद से इस्तीफा दे दिया।

-इसी साल विधि आयोग की 80वीं रिपोर्ट में फिर बताई गई नियुक्ति प्रक्रिया। इसमें नियुक्ति के लिए हाई लेबल पैनल के गठन का सुझाव दिया।

1987 - राष्ट्रीय न्यायिक सेवा आयोग पर विधि आयोग की 121वीं रिपोर्ट

1990 - राष्ट्रीय न्यायिक आयोग विधेयक

1993 - सुप्रीम कोर्ट का फैसला, नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का दखल समाप्त किया। जजों की नियुक्ति न्यायपालिका ने अपने हाथ में ले ली।

1998 - सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1993 के फैसले को सही ठहराया। नियुक्ति की कोलीजियम व्यवस्था लागू हुई।

2010 - दिल्ली हाई कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर को सूचना कानून के दायरे में बताया

कानूनविद शांतिभूषण की राय

न्यायपालिका के विरोध की वजह से जजों की नियुक्त और आरोपी जजों को हटाने का कोई कारगर तंत्र नहीं बन पाया। न्यायपालिका का विरोध स्वाभाविक है। कोई व्यक्ति जवाबदेह होने से कतराता है। जजों को हटाने की महाभियोग की इतनी जटिल प्रक्रिया है कि कभी सफल ही नहीं होती। जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग गठित होना चाहिए।

[आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार के विधि मंत्री शांतिभूषण ने कानून में संशोधन कर आपातकाल घोषित करना मुश्किल किया और न्यायपालिका को शक्तिशाली बनाया था] जागरण डाटकाम

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