मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

समय सापेक्ष विशेष: डॉ. हरिवंशराय बच्चन जन्म शताब्दी समारोह


'मधुशाला' के रचयिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इन दिनों डाक्टर हरवंश राय बच्चन जी का जनम शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है । "समय सापेक्ष " ने भी उनकी अमर कृति मधुशाला पर सन २००६ के जनवरी अंक में इस महान कृति के बारे में मशहूर ग़ज़ल कार श्री महेंद्र हुमा के उदगार प्रकाशित किये थे । इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन्‌ 1941 से 1952 तक वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अँगरेजी के प्राध्यापक रहे। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 'डब्ल्यू.वी. येट्स एंड ऑकल्टिजम' विषय पर शोध किया। फिर कुछ महीने आकाशवाणी, इलाहाबाद में काम करने के बाद 1955 में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में विशेष कार्याधिकारी (हिंदी) नियुक्त हुए। सन्‌ 1966 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया...'मधुशाला' के रचयिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन्‌ 1941 से 1952 तक वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अँगरेजी के प्राध्यापक रहे। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से 'डब्ल्यू.वी. येट्स एंड ऑकल्टिजम' विषय पर शोध किया। फिर कुछ महीने आकाशवाणी, इलाहाबाद में काम करने के बाद 1955 में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में विशेष कार्याधिकारी (हिंदी) नियुक्त हुए। सन्‌ 1966 में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। बच्चनजी सन्‌ 1935 में 'मधुशाला' के कारण ख्यात हुए। यह रचना तब से लेकर आज तक पाठकों को मदमत्त करती आ रही है। उनकी अन्य रचनाओं में मधुकलश, मधुकाव्य, खादी के फूल प्रमुख हैं। बच्चनजी ने अपनी आत्मकथा चार खंडों में लिखी। ये खंड सन्‌ 1969 से 1985 की अवधि में प्रकाशित हुए। इनके नाम हैं- 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' (जन्म 1936 तक), 'नीड़ का निर्माण फिर' (1951 तक), 'बसेरे से दूर' (1955 तक) और 'दशद्वार से सोपान तक' (1985 तक) उन्हें पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार, अफ्रीका-एशिया लेखक संघ कॉन्फ्रेंस का लोटस पुरस्कार, साहित्य वाचस्पति उपाधि तथा प्रथम सरस्वती सम्मान से नवाजा जा चुका है। पंतजी ने अमिताभ का नामकरण किया था। तेजी तो बड़ी तीव्र गति से बदल रही थीं। मैंने उन्हें प्रेयसी के रूप में जाना ही था कि वे पत्नी हो गईं, पत्नी होते उन्हें देर नहीं लगी कि उनमें मातृत्व का बीजारोपण हो गया। नारी बड़ी लचीली होती है, वह परिवर्तनों को बड़ी आसानी से झेल लेती है। पुरुष इतना नमनीय नहीं होता। प्रेमी से पति और पति से भविष्य पिता इस परिवर्तन के प्रत्यक्ष होने पर भी मेरा मन अभी अपने प्रेमी रूप पर ही अटका था। विवाह के कई वर्षों बाद तक जो मैं प्रेम की कविताएँ लिखता रहा, शायद उसका एक रहस्य यही है। फिर मैं कवि था, कलाकार था। मेरे भौतिक जीवन के विकास के साथ, समानांतर मेरा एक वांगमय जीवन भी चल रहा था। जीवन सहसा घटित का अनभ्यस्त नहीं, कला की दुनिया उससे अपनी पटरी नहीं बिठा पाती। मेरे वांगमय जीवन को कला की सहज, स्वाभाविक, क्रमानुगत गति से ही बदलना था। इसकी ओर शायद मैं पहले भी संकेत कर चुका हूँ। मुझे समझने में थोड़ा मेरे कवि को भी समझना कि तेजी ने मुझे जगाकर बताया कि उनके पेट में पीड़ा आरंभ हो गई है। ब्रह्म मुहूर्त था। सपना इतना स्पष्ट था और मैं उसे इतना अभिभूत था कि मैं उसे बगैर तेजी से बताए न रहा सका। तर्क वाली व्याख्या तो सपने की मैंने बाद में की। पर उस अधजागे-अधसोए से मेरे मुँह से निकल गया, तेजी तुम्हें लड़का ही होगा और उसके रूप में मेरे पिताजी की आत्मा आ रही है। तेजी ने इस सपने को परा-प्रकृति का संकेत समझा और आज भी उन्हें इसके विषय में संदेह या अविश्वास नहीं है। मनोवैज्ञानिक समाधान शायद स्वप्न का यह है कि उस दिन मुझे पिताजी की बहुत याद आई थी, मानस पाठ करते हुए उनका रूप बचपन से मेरे दिमाग में बैठा था, तेजी के प्रसविनी बनने का समय आ पहुंचा था और इस संबंध में कई तरह के प्रश्न मेरे मन में उठते थे। मेरे अवचेतन ने जैसे उस स्वप्न के रूप में उनका उत्तर दिया पर इस उत्तर से न तो मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ और न रहस्य पर से पूरी तरह परदा ही हटा है। अपने पारिवारिक जीवन में मुझे कई बार इसका अनुभव हुआ है, जैसे मेरे पिताजी की आत्मा हमारे बीच सक्रिय है। इसे मैं तर्क से सिद्ध नहीं कर सकता। सब कुछ तर्क से सिद्ध किया भी नहीं जा सकता और हैमलेट के शब्दों में कहना पड़ता है, ...ओ होरेशियो, सुनो हमारे दर्शन की कल्पना जहाँ तक पहुँच सकी है, धरा-गगन में उसके आगे बहुत पड़ा है।एक बात को याद कर आज भी हंसी आती है कि यह जानने के लिए कि यह दर्द प्रसव का है या अन्य किसी प्रकार का, हमने एक किताब खोली! उसमें लिखा था कि प्रसव की पीड़ा लगातार न होकर रह-रहकर उठती है और यह दर्द पीठ की ओर से उठकर पेट की ओर चलता है। दर्द का लक्षण इसमें मिलता-जुलता देखकर मैं लेडी डॉक्टर बरार को बुला लाया और वे तेजी को अपनी मोटर में बिठाकर अपने नर्सिंग होम ले गईं। नारी जीवन के एक महत्वपूर्ण अवसर और संकटापन्न स्थिति में एक बार फिर वे सर्वथैव एकाकी थीं। पर उन्होंने अपने मन को छोटा नहीं किया था। अपराह्न में दिनभर की कठिन प्रसव पीर के पश्चात तेजी ने पुत्र को जन्म दिया। पंतजी, जैसा पूर्व निश्चित था, दिन को ही घर पर आ गए थे। शाम को वे प्रसूता और प्रसूत को देखने आए तो बच्चे को देखकर उन्होंने अमिताभ नाम दिया। पिता बनने की अनुभूति और उसके उल्लास को, विशेषकर जब उसका अवसर विलंब से जीवन में आए, गद्य नहीं वहन कर सकता- 'दशरथ पुत्र जन्म सुनि काना : मानहूँ ब्रह्मानंद समाना'। इसलिए उस दिवस की स्मृति में लिखी कविता का आश्रय लेना चाहता हूँ। फुल कमल, गोद नवल, मोद नवल,गेह में विनोद नवल। बाल नवल, लाल नवल,दीपक में ज्वाल नवल। आत्मकथा (नीड़ का निर्माण फिर, हरिवंशराय बचन)

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